कुश्ती बेटिंग: अखाड़े से मैट तक
गाँव के अखाड़ों से ओलंपिक पदक तक, कुश्ती भारत के सबसे गौरवशाली खेलों में से एक है।
अपडेट: 5 अक्तूबर 2026
कुश्ती बेटिंग भारत में ख़ास भावना से जुड़ी है, क्योंकि हरियाणा और महाराष्ट्र के अखाड़ों से निकले पहलवानों ने कई ओलंपिक और विश्व पदक जीते हैं। विश्व मंच पर दो शैलियाँ हैं: फ़्रीस्टाइल, जहाँ पैरों को पकड़ना मान्य है, और ग्रीको-रोमन, जहाँ केवल कमर से ऊपर पकड़ की अनुमति है। महिलाएँ फ़्रीस्टाइल में मुक़ाबला करती हैं।
मुक़ाबला कैसे जीता जाता है
- फ़ॉल (पिन): विरोधी के दोनों कंधे मैट पर टिका देना, तुरंत जीत।
- तकनीकी श्रेष्ठता: अंकों में बड़ी बढ़त होते ही मुक़ाबला रुक जाता है।
- अंकों पर जीत: दो पीरियड के बाद ज़्यादा अंक।
भारतीय दर्शकों के लिए दंगल की परंपरा और ओलंपिक मैट की कुश्ती में बड़ा अंतर यही है कि मैट पर अंक-प्रणाली और समय-सीमा बहुत सख़्त होती है।
बाज़ार और संकेत
बेटिंग में आमतौर पर मुक़ाबला विजेता, टूर्नामेंट में स्वर्ण पदक विजेता, और कभी-कभी जीत का तरीक़ा मिलता है। वज़न घटाकर वर्ग में उतरने का असर, ड्रॉ (टूर्नामेंट ब्रैकेट में किस हिस्से में पहलवान है) और रेपेचेज (हारे हुए पहलवानों को कांस्य का दूसरा मौक़ा) पदक बाज़ार पर असर डालते हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
फ़्रीस्टाइल और ग्रीको-रोमन में क्या फ़र्क़ है?
ग्रीको-रोमन में कमर के नीचे पकड़ना या पैरों से हमला वर्जित है; फ़्रीस्टाइल में यह मान्य है।
रेपेचेज क्या होता है?
फ़ाइनल तक पहुँचे पहलवानों से हारने वाले खिलाड़ियों को कांस्य पदक के लिए दोबारा मौक़ा देने की प्रणाली।